तुलसीदास जी द्वारा रचित 'रामचरितमानस' से लिया गया प्रसंग। श्रीराम और लक्ष्मण के साथ परशुराम जी का संवाद, जिसमें क्षत्रियों के अहंकार का विनाश और राम के सौम्य व्यक्तित्व का दर्शन होता है।
प्रस्तुत पाठ 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद' तुलसीदास जी के महाकाव्य 'रामचरितमानस' के 'बालकाण्ड' से उद्धृत है। यह अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है जिसमें परशुराम जी का क्रोध, लक्ष्मण का अहंकारपूर्ण व्यवहार और श्रीराम का सौम्य, संयमित और सत्त्वगुणी चरित्र चित्रित हुआ है। परशुराम जी शिवजी के धनुष तोड़ने पर क्रोधित होकर आते हैं, किंतु श्रीराम के विनम्र व्यवहार से उनका क्रोध शांत हो जाता है। यह संवाद क्षत्रिय-अहंकार के दमन और आदर्श पुरुष के गुणों को दर्शाता है।
1532 ई. (विक्रम संवत् 1589), राजापुर, उत्तर प्रदेश
1623 ई. (लगभग), वाराणसी
रामभक्ति के महान कवि, भक्तिकाल की निर्गुण शाखा के सगुण शाखा के प्रमुख कवि। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के उपासक।
रामचरितमानस, विनय पत्रिका, गीतावली, कवितावली, दोहावली, रामाज्ञाप्रश्न
अवधी, ब्रजभाषा, संस्कृत मिश्रित। सरलता, प्रवाहमयता, लोकोक्तियाँ, अलंकारों का सुंदर प्रयोग।
रामचरितमानस को 'तुलसीकृत रामायण' कहा जाता है। उन्होंने राम को आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया।
जनकपुर में शिवजी के धनुष को तोड़ने की प्रतिज्ञा थी। वह धनुष अत्यंत भारी था, जिसे आज तक कोई नहीं उठा सका था। विश्वामित्र के साथ आए श्रीराम ने वह धनुष उठाकर तोड़ दिया। यह सुनकर परशुराम जी क्रोधित होकर वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने क्षत्रियों के अहंकार को चूर-चूर करने की अपनी प्रतिज्ञा दोहराई। लक्ष्मण ने उनका तिरस्कार किया और युद्ध की चुनौती दी, किंतु श्रीराम ने लक्ष्मण को रोका। श्रीराम के विनम्र और सौम्य व्यवहार से परशुराम जी प्रसन्न हो गए और उन्होंने श्रीराम को वह धनुष भेंट कर दिया। इस प्रकार परशुराम का क्रोध शांत हुआ।
(प्रस्तुत पाठ में कई दोहे और चौपाइयाँ हैं। छात्रों के लिए मुख्य पद्यांश नीचे दिए गए हैं।)
परशुराम जी जनकपुर पहुँचते हैं और पूछते हैं कि किस क्षत्रिय ने शिवधनुष तोड़ा है। वे कहते हैं कि मैंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित किया है, अब भी क्षत्रियों का अहंकार नहीं गया। वे लक्ष्मण को तीर चलाने की चुनौती देते हैं। लक्ष्मण उत्तर देते हैं कि तुम्हारा क्रोध और तीर हमें भयभीत नहीं करते।
श्रीराम लक्ष्मण को रोकते हुए कहते हैं कि हे लक्ष्मण! तुम परशुराम जी से कठोर वचन न बोलो। वे ब्राह्मण हैं और हमारे पूज्य हैं। श्रीराम परशुराम जी के चरणों में प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि हम आपके शरणागत हैं। परशुराम जी राम के सौम्य व्यवहार से प्रसन्न हो जाते हैं।
प्रसंग: यह पंक्ति परशुराम जी लक्ष्मण को संबोधित करते हुए कहते हैं।
व्याख्या: परशुराम जी लक्ष्मण से कहते हैं कि हे तात (पुत्र), तूने धनुष तोड़ा है और मेरे मन में क्रोध हो रहा है। तू मूर्ख है, तू किस मन से बोल रहा है? यहाँ परशुराम के क्रोध और लक्ष्मण के अहंकार का संकेत है।
प्रसंग: परशुराम को क्रोधित देखकर श्रीराम चुपचाप खड़े हैं।
व्याख्या: इस पंक्ति में श्रीराम के संयम और धैर्य का चित्रण है। वे परशुराम के क्रोध के सामने मौन धारण करते हैं, जो उनके महान चरित्र को दर्शाता है। यह उनके सौम्य और सदाचारी व्यक्तित्व का प्रतीक है।
मर्यादा पुरुषोत्तम: संयमी, विनम्र, गुरुजनों का सम्मान करने वाले। लक्ष्मण को परशुराम की अवहेलना करने से रोकते हैं। परशुराम के चरणों में प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न करते हैं। आदर्श पुत्र, मर्यादाओं का पालन करने वाले।
उत्साही और साहसी: श्रीराम के अनन्य सेवक, परशुराम के क्रोध का उत्तर देने में पीछे नहीं हटते। क्षत्रिय वीरता के धनी, किंतु कभी-कभी अहंकार भी दिखाते हैं। श्रीराम के समझाने पर उनकी बात मान लेते हैं।
क्रोधी किन्तु न्यायप्रिय: शिवभक्त, क्षत्रियों के अहंकार का नाश करने का संकल्प लिए। श्रीराम के विनम्र व्यवहार से प्रभावित होकर अपना क्रोध त्याग देते हैं। उनके मन में क्षत्रियों के प्रति घृणा है, किंतु राम के गुणों को पहचानते हैं।
उत्तर: परशुराम जी ने शिवजी के धनुष को सुनकर प्रतिज्ञा की थी कि जो भी उस धनुष को तोड़ेगा, उससे युद्ध करेंगे। श्रीराम ने धनुष तोड़ दिया था, इसलिए परशुराम जी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार युद्ध करने आए। साथ ही, उन्हें क्षत्रियों के अहंकार को समाप्त करने का संकल्प था।
उत्तर: लक्ष्मण ने परशुराम जी के क्रोध का सामना करते हुए उनसे तीर चलाने की चुनौती दी और कठोर वचन कहे। उनका अहंकार परशुराम जी को और अधिक क्रोधित कर रहा था। किंतु श्रीराम ने बीच-बचाव कर लक्ष्मण को रोका और परशुराम से विनम्रता से पेश आए। इससे परशुराम का क्रोध शांत हो गया।
उत्तर: श्रीराम की विनम्रता, संयम, धैर्य, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और शरणागत वत्सलता ने परशुराम को प्रभावित किया। उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया और उनसे कहा कि आपके समान विनीत और मर्यादित पुरुष मैंने नहीं देखा। यही कारण था कि परशुराम का क्रोध शांत हुआ।
उत्तर: तुलसीदास ने इस संवाद के माध्यम से यह संदेश दिया है कि विनम्रता, धैर्य और मर्यादा का पालन करने वाले व्यक्ति की विजय होती है, न कि अहंकार और क्रोध की। क्रोध से क्षति होती है, जबकि विनम्रता से बड़े-बड़े शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। परशुराम जैसा क्रोधी भी श्रीराम के सद्व्यवहार से प्रसन्न हो गया।
उत्तर: परशुराम जी के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:
(i) क्रोधी एवं प्रतिज्ञाबद्ध - उन्होंने क्षत्रियों का अहंकार नष्ट करने की प्रतिज्ञा ली थी।
(ii) शिवभक्त - शिवजी के धनुष को मानने वाले।
(iii) न्यायप्रिय - राम के विनम्र व्यवहार को देखकर वे अपने निर्णय में परिवर्तन कर लेते हैं।
(iv) ब्राह्मण तेज के धनी - उनमें तप और संयम भी है।